सवाल क्या करूँ तुझ से गुनाहगार हूँ मैं
निगाह चार हो क्यूँ-कर कि शर्मसार हूँ मैं
रवाना रख कि जहाँ में ज़लील-ओ-ख़्वार हूँ मैं
जो हूँ सो हूँ प तिरे दर का ख़ाकसार हूँ मैं
पड़ा हुआ हूँ बुतों की गली में दिल थामे
सबा सँभल के ज़रा चल नहीफ़-ओ-ज़ार हूँ मैं
कसी से मतलब-ए-दिल मेरा हल नहीं होता
सवाल-ए-मसअला-ए-जब्र-ओ-इख़्तियार हूँ मैं
जफ़ा-ओ-ज़ुल्म उस के गिला करूँ क्यूँ-कर
सितम-शिआर है वो और वफ़ा-शिआर हूँ मैं
तुम्हीं बताओ करे सब्र कब तलक कोई
न हर कसी से हँसो तुम न अश्क-बार हूँ मैं
इसी को कहते हैं या-रब नसीब की यारी
कि यार वो भी न हो और बे-दयार हूँ मैं
वफ़ा का लुत्फ़ मिले गर हज़ार जानें हों
निसार तुझ पे मिरी जाँ हज़ार बार हूँ मैं
ज़बाँ हो बंद ज़बाँ से अगर सवाल करूँ
क़लम हों हाथ अगर मुद्दआ-निगार हूँ मैं
इलाही जज़्ब-ए-मोहब्बत में दे असर इतना
कलेजा थाम ले वो भी जो बे-क़रार हूँ मैं
हज़ार अपनी कहूँ उस की एक भी न सुनूँ
ख़ुदा वो दिन करे उस से कहीं दो-चार हूँ मैं
मैं मस्त-ए-बादा-ए-हुब्ब-ए-अली हूँ ऐ 'अंजुम'
कभी बहक न सके जो वो बादा-ख़्वार हूँ मैं
ग़ज़ल
सवाल क्या करूँ तुझ से गुनाहगार हूँ मैं
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

