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सवाब है या किसी जनम का हिसाब कोई चुका रहा हूँ | शाही शायरी
sawab hai ya kisi janam ka hisab koi chuka raha hun

ग़ज़ल

सवाब है या किसी जनम का हिसाब कोई चुका रहा हूँ

भारत भूषण पन्त

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सवाब है या किसी जनम का हिसाब कोई चुका रहा हूँ
जो घर के आँगन में चिंटियों को मैं रोज़ आटा खिला रहा हूँ

मैं रक़्स करता हुआ बगूला जो दश्त-ए-जाँ में भटका चुका है
अब अपनी साँसों की आँधियों से बस अपनी मिट्टी उड़ा रहा हूँ

वो मंज़िलें क्या ये रास्ते भी मुझी को ले कर भटक गए हैं
न चल रहा हूँ न रुक रहा हूँ न जा रहा हूँ न आ रहा हूँ

क़रीब आती हर एक शय ने मिरा नज़रिया बदल दिया है
मैं जिस के पीछे पड़ा हुआ था उसी से पीछा छुड़ा रहा हूँ

वो रब्त-ए-बाहम नहीं है लेकिन अभी भी रिश्ता बना हुआ है
वो मुझ से दूरी बढ़ा रहा है मैं उस से क़ुर्बत घटा रहा हूँ

मिरे ही अपने मुहीब साए मुझी को घेरे खड़े हुए हैं
किसी को आँखें दिखा रहा हूँ किसी से आँखें चुरा रहा हूँ

मैं आइना हूँ तो कौन है ये आइना है तो कौन हूँ मैं
इन्हीं सवालों से तंग आ कर मैं सब शबीहें हटा रहा हूँ

मुझे यक़ीं है इसे जला कर मैं अपने सब डर मिटा सकूँगा
सो एक कपड़े में रूई भर कर मैं अपना पुतला बना रहा हूँ