EN اردو
सत्‌ह-बीं थे सब, रहे बाहर की काई देखते | शाही शायरी
sath-biin the sab, rahe bahar ki kai dekhte

ग़ज़ल

सत्‌ह-बीं थे सब, रहे बाहर की काई देखते

रियाज़ मजीद

;

सत्‌ह-बीं थे सब, रहे बाहर की काई देखते
लोग कैसे मेरे अंदर की सफ़ाई देखते

उस से मिलने का निशाँ तक भी नज़र आता नहीं
एक मुद्दत हो गई राह-ए-जुदाई देखते

हम तो अपनी वुसअत-ए-दिल से भी कोसों दूर थे
तेरे दिल तक किस तरह अपनी रसाई देखते

आप ही थक-हार कर अपने को बेहिस कर लिया
ज़िंदगी कब तक तिरी बे-ए'तिनाई देखते

यूँ न खो जाते फ़ज़ा-ए-यास में दुनिया के साथ
काश अपना ही लब-ओ-लहजा रजाई देखते

दिल की मजबूरी से बढ़ कर कोई मजबूरी न थी
हम भी कुछ करते अगर ख़ुद से रिहाई देखते

काश धरती पर गिरा ख़ूँ रंग ले आता 'रियाज़'
जीते-जी हम अपनी फ़सलों की कटाई देखते