सरसब्ज़ ये जंगल चाहत का वो दश्त-ए-वफ़ा है वीराँ भी
है दिल को सुकूँ भी देख के ये और ज़ेहन-ए-रसा है हैराँ भी
ये भी है क़रीना इक शायद हस्ती में तवाज़ुन रखने का
कुछ राज़ अयाँ कर लोगों पर कुछ हाल मगर रख पिन्हाँ भी
इक ज़र्ब अना ने ज़ेर-ओ-ज़बर कर डाला मोहब्बत का मेहवर
अब उस से पनाह रब चाहें थे जिस पे कभी हम नाज़ाँ भी
इस दौर-ए-ज़ेहानत में जब जब दस्तूर-ए-अमाँ पर बात हुई
आया है कटहरे में अक्सर तब साथ हमारे यज़्दाँ भी
इक लहज़ा सितम इक लम्हा करम हम पर है ये एहसाँ उन का सदा
राज़ी भी हूँ इक साअ'त में मगर हो जाते हैं पल में नालाँ भी
है अक़्ल समझने से क़ासिर पहलू ये तमद्दुन का अब तक
मल्बूस जहाँ हैं मर्द बहुत औरत है वहीं पर उर्यां भी
अपना तो नहीं कुछ लोगों को ये देख के हैरानी है बहुत
हैं जिस से गिले-शिकवे भी हमें रहते हैं उसी पर नाज़ाँ भी
शाइ'र हैं अमल के मैदाँ से कुछ दूर तो उस में हैरत क्यूँ
ग़ज़लों की ज़मीनों पर उन को देखोगे बहुत सरगर्दां भी
उस से भी पता चलता है कि हाँ ख़ल्लाक़-ए-दो-आलम है कोई
हर शय है अलग पहचान लिए इक नज़्म है सब में यकसाँ भी
अब हम में नहीं वो जोश-ए-जुनूँ उस में भी नहीं वो बात कि जो
राहत का सबब थे दिल के लिए जानाँ नहीं ज़िक्र-ए-जानाँ भी
क़िस्मत के अँधेरे में भी रही आँखों में मिरी इक काहकशाँ
तारीक नहीं कर पाए कभी ख़्वाबों को सवाद-ए-ज़िन्दाँ भी
नफ़रत से मोहब्बत से अक्सर हम ने ही लिखी तक़दीर तिरी
हम ने ही ज़मीन-ए-गुल तुझ को जन्नत भी किया और वीराँ भी
तकरार-ए-सितमगर से बेहतर रुख़्सत लो यहाँ से 'अतहर'-जी
ये काम तो तुम कर सकते हो ये काम लगे है आसाँ भी
ग़ज़ल
सरसब्ज़ ये जंगल चाहत का वो दश्त-ए-वफ़ा है वीराँ भी
अतहर शकील

