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सर झुकाता नहीं कभी शीशा | शाही शायरी
sar jhukata nahin kabhi shisha

ग़ज़ल

सर झुकाता नहीं कभी शीशा

हातिम अली मेहर

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सर झुकाता नहीं कभी शीशा
हम से करता है सर-कशी शीशा

कुर्र-ए-नार है मिरा सीना
शीशा-ए-दिल है आतिशी शीशा

दिल में रक्खा था उस को दिल भी गया
उड़ गई ले के इक परी शीशा

दुख़्तर-ए-रज़ पे ज़ोर-ए-आलम है
इस परी से हुआ परी शीशा

ख़ून रोता है क़हक़हे के साथ
ख़ूब हँसता है ये हँसी शीशा

ज़ख़्म-ए-दिल का जो फट गया अंगूर
होएगा मय का मुस्तजी शीशा

याद आता है मुझ को दिल ऐ 'मेहर'
देखता हूँ मैं जब कभी शीशा