सर-ए-तस्लीम ख़म करना पड़ा तक़्सीर से पहले
मोहब्बत की सज़ा मुझ को मिली ता'ज़ीर से पहले
बुरा होगा हमारी राह में आया अगर कोई
कि हम शमशीर बन जाएँगे ख़ुद शमशीर से पहले
मोहब्बत की नज़र इक इक नफ़स पर काम करती है
तुझे हम देख लेते हैं तिरी तस्वीर से पहले
मोहब्बत का ज़माना भी अजब दिलकश ज़माना था
असीरी मेरी साबित हो गई ज़ंजीर से पहले
हमारे नामा-ए-पुर-शौक़ लिखने पर ये पाबंदी
क़लम की जाएँगी क्या उँगलियाँ तहरीर से पहले
मोहब्बत की अमानत यूँही इंसाँ ने नहीं पाई
किया है ग़ौर ख़ुद क़ुदरत ने भी तक़दीर से पहले
कोई ऐसे में बेदारी का दे पैग़ाम ऐ 'शाइर'
ज़माना होश में आता नहीं तक़रीर से पहले
ग़ज़ल
सर-ए-तस्लीम ख़म करना पड़ा तक़्सीर से पहले
शायर फतहपुरी

