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संग-ए-दुश्नाम को गौहर जाना | शाही शायरी
sang-e-dushnam ko gauhar jaana

ग़ज़ल

संग-ए-दुश्नाम को गौहर जाना

नूर बिजनौरी

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संग-ए-दुश्नाम को गौहर जाना
हम ने दुश्मन को भी दिलबर जाना

नंग-ए-उल्फ़त ही रहा परवाना
उस को आता है फ़क़त मर जाना

पूछ लेना दर-ओ-दीवार का हाल
ऐ बगूलो जो मिरे घर जाना

सर क़लम करते रहे ज़ुल्म के हाथ
यार लोगों ने मुक़द्दर जाना

कम-निगाही ने डुबोया हम को
एक क़तरे को समुंदर जाना

तेशा-बरदार को फ़रहाद कहा
आईना-गर को सिकंदर जाना

हम हक़ीक़त में थे कोहसार मगर
ख़ुद को ज़र्रों से भी कम-तर जाना