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समुंदर दश्त पर बुत काटती है | शाही शायरी
samundar dasht par but kaTti hai

ग़ज़ल

समुंदर दश्त पर बुत काटती है

मुनीर सैफ़ी

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समुंदर दश्त पर बुत काटती है
मुसीबत को मुसीबत काटती है

छुपाऊँ सर तो खुल जाता है पाँव
ज़रूरत को ज़रूरत काटती है

ज़मीं करती है बातें आसमाँ से
यहाँ हर शय की क़ीमत काटती है

मज़ा फुट-पाथ का पूछो न यारो
इमारत की मुझे छत काटती है

फ़क़ीरी में है इतना लुत्फ़ यारो
कि मुझ को बादशाहत काटती है

ग़नीमत जानिए जंगल में बसना
हमें अब आदमियत काटती है

बुज़ुर्गों का कहा कब मानते हैं
कि बच्चों को नसीहत काटती है

बदन में चुभती हैं नज़रों की किर्चें
उसे लोगों की निय्यत काटती है

हुआ हूँ इस क़दर बदनाम 'सैफ़ी'
मुझे अब मेरी शोहरत काटती है