समुंदर दश्त पर बुत काटती है
मुसीबत को मुसीबत काटती है
छुपाऊँ सर तो खुल जाता है पाँव
ज़रूरत को ज़रूरत काटती है
ज़मीं करती है बातें आसमाँ से
यहाँ हर शय की क़ीमत काटती है
मज़ा फुट-पाथ का पूछो न यारो
इमारत की मुझे छत काटती है
फ़क़ीरी में है इतना लुत्फ़ यारो
कि मुझ को बादशाहत काटती है
ग़नीमत जानिए जंगल में बसना
हमें अब आदमियत काटती है
बुज़ुर्गों का कहा कब मानते हैं
कि बच्चों को नसीहत काटती है
बदन में चुभती हैं नज़रों की किर्चें
उसे लोगों की निय्यत काटती है
हुआ हूँ इस क़दर बदनाम 'सैफ़ी'
मुझे अब मेरी शोहरत काटती है
ग़ज़ल
समुंदर दश्त पर बुत काटती है
मुनीर सैफ़ी

