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समन-बरों से चमन दौलत-ए-नुमू माँगे | शाही शायरी
saman-baron se chaman daulat-e-numu mange

ग़ज़ल

समन-बरों से चमन दौलत-ए-नुमू माँगे

गौहर होशियारपुरी

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समन-बरों से चमन दौलत-ए-नुमू माँगे
हवा-ए-दामन-ए-गुल गेसुओं की बू माँगे

तराज़-ए-शोख़ी-ए-पा है ग्याह-ए-सब्ज़ की माँग
ख़िराम-ए-नाज़ का अंदाज़ आब-जू माँगे

बिखरती ज़ुल्फ़ से टूटे ग़ुरूर-ए-शब का तिलिस्म
सहर का हुस्न फ़ुसून-ए-रुख़-ए-निकू माँगे

वरक़ वरक़ गुल-ए-तर मौज मौज बाद-ए-सहर
बदन का लम्स तिरे पैरहन की बू माँगे

शिगाफ़-ए-कोह न था तेशा-ए-वफ़ा की तलब
ये जू-ए-शीर अभी और कुछ लहू माँगे

शिकस्त-ए-शीशा-ए-पिंदार की सदा भी सुन
करम की भीक जब उस संग-दिल से तू माँगे

कहाँ वो शोख़ मगर अपना नुत्क़-ओ-लब 'गौहर'
उसी का ज़िक्र पए-ज़ेब-ए-गुफ़्तुगू माँगे