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समझ सको तो ये तिश्ना-लबी समुंदर है | शाही शायरी
samajh sako to ye tishna-labi samundar hai

ग़ज़ल

समझ सको तो ये तिश्ना-लबी समुंदर है

शकेब जलाली

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समझ सको तो ये तिश्ना-लबी समुंदर है
ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ हर इक आदमी समुंदर है

उभर के डूब गई कश्ती-ए-ख़याल कहीं
ये चाँद एक भँवर चाँदनी समुंदर है

जो दास्ताँ न बने दर्द-ए-बेकराँ है वही
जो आँख ही में रहे वो नमी समुंदर है

न सोचिए तो बहुत मुख़्तसर है सैल-ए-हयात
जो सोचिए तो यही ज़िंदगी समुंदर है

तू इस में डूब के शायद उभर सके न कभी
मिरे हबीब मिरी ख़ामुशी समुंदर है