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समझ रहा है तिरी हर ख़ता का हामी मुझे | शाही शायरी
samajh raha hai teri har KHata ka hami mujhe

ग़ज़ल

समझ रहा है तिरी हर ख़ता का हामी मुझे

राशिद आज़र

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समझ रहा है तिरी हर ख़ता का हामी मुझे
दिखा रहा है ये आईना मेरी ख़ामी मुझे

ज़माँ की क़ैद है कोई न है मकाँ की ख़बर
कहाँ कहाँ लिए फिरती है तिश्ना-कामी मुझे

नहीं कि जुरअत-ए-इज़हार-ए-इश्क़ मुझ में नहीं
तबाह कर के रही मेरी नेक-नामी मुझे

कोई नहीं मिरा सामे इसी में ख़ुश हूँ मैं
कि रास आई बहुत मेरी ख़ुद-कलामी मुझे

मज़ा मिला न कभी मंज़िल-आश्नाई का
कुछ ऐसा कर गई आवारा तेज़-गामी मुझे

हसीन चेहरों को तेवरी के बल बिगाड़ते हैं
गिराँ गुज़रती है फ़ितरत की बद-निज़ामी मुझे

शराब-ए-तुंद की तल्ख़ी का ज़ाइक़ा जैसे
पसंद आई हसीनों की बद-कलामी मुझे

नशात-ए-तकिया-ए-ज़नू से सर उठाने तक
सितारा सुब्ह का देता रहा सलामी मुझे

मैं फ़र्श-ए-राह यूँही तो नहीं हुआ 'आज़र'
निढाल कर के रही उस की ख़ुश-ख़िरामी मुझे