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सलामत आए हैं फिर उस के कूचा-ओ-दर से | शाही शायरी
salamat aae hain phir uske kucha-o-dar se

ग़ज़ल

सलामत आए हैं फिर उस के कूचा-ओ-दर से

रज़ी अख़्तर शौक़

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सलामत आए हैं फिर उस के कूचा-ओ-दर से
न कोई संग ही आया न फूल ही बरसे

मैं आगही के अजब मंसबों पे फ़ाएज़ हूँ
कि आप अपना ही मुंकिर हूँ अपने अंदर से

न जाने किस को ये एज़ाज़-ए-फ़न मिला होगा
तमाम शहर में बिखरे हुए हैं पत्थर से

अब इस के मौज-ओ-तलातुम में डूबने से न डर
गुहर भी तुझ को मिले थे उसी समुंदर से

ये एहतिमाम-ए-चराग़ाँ भी किस कमाल का है
दिए जले हैं तो मैं बुझ गया हूँ अंदर से

अजब समाँ था कि अब तक हैं ज़ख़्म ज़ख़्म आँखें
मैं कोर-चश्म भला आगही के मंज़र से