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सख़्त-जानी का सही अफ़्साना है | शाही शायरी
saKHt-jaani ka sahi afsana hai

ग़ज़ल

सख़्त-जानी का सही अफ़्साना है

मुनीर शिकोहाबादी

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सख़्त-जानी का सही अफ़्साना है
शाहिद-ए-तेग़-ए-ज़बाँ दन्दाना है

मक़्तल-ए-आलम मिरा वीराना है
दीदा-ए-बिस्मिल चराग़-ए-ख़ाना है

शम-ए-रौशन आरिज़-ए-जानाना है
ख़ाल-ए-मुश्कीं शम्अ' का परवाना है

दिल में अक्स-ए-चेहरा-ए-जानाना है
आइने का आइने में ख़ाना है

कौन दुनिया में रहे दीवाना है
एक उजड़ा सा मुसाफ़िर ख़ाना है

तेरी महफ़िल काबा है ऐ शम्अ'-रू
ताएर-ए-क़िबला-नुमा परवाना है

आँखें मलता हूँ तुम्हारी ज़ुल्फ़ से
पंजा-ए-मिज़्गाँ ब-रंग-ए-शाना है

शम्अ'-रूयों की तजल्ली देखिए
किर्मक-ए-शब-ताब हर परवाना है

आब-ए-ख़ंजर क्या शराब-ए-नाब थी
रक़्स-ए-बिस्मिल लग़्ज़िश-ए-मस्ताना है

ख़ल्क़-ए-आलम को पहुँचता है गज़ंद
नफ़्स-ए-अम्मारा सग-ए-दीवाना है

बादा-नोशान-ए-अज़ल हैं सेर-चश्म
जिस तरफ़ देखें उधर मय-ख़ाना है

अब्र आता है तो बिकती है शराब
नक़्द-ए-रहमत हासिल-ए-मय-ख़ाना है

एक तेरे नाम का करता हूँ ज़िक्र
मुझ को विर्द-ए-सुब्हा-ए-यक-दाना है

खाते हैं अंगूर पीते हैं शराब
बस यही मस्तों का आब-ओ-दाना है

किस तरफ़ करते हो सज्दे ज़ाहिदो
काबा एक उजड़ा हुआ बुत-ख़ाना है

चश्म-ए-मूसा के हों पर्दे कान में
लन-तरानी का बयान अफ़्साना है

ठंडे ठंडे सोते हैं ज़ेर-ए-ज़मीं
गोर अपने वास्ते तह-ख़ाना है

क्या बने सौदा तिरा ऐ ख़ुद-फ़रोश
मोल जो हम ने कहा बैआ'ना है

देखते हैं बुत मिरी बेताबियाँ
सर बहकना सज्दा-ए-शुकराना है

क्या तिरा आईना-ए-रू साफ़ है
नक़्द-ए-जाँ लेता यहाँ जुर्माना है

गर्म नाले सर्द हैं ऐ हम-सफ़ीर
ज़ाहिरन कुंज-ए-क़फ़स ख़स-ख़ाना है

की मय-ए-मुफ़्त आज क़ाज़ी ने हलाल
फ़ी-सबीलिल्लाह हर मय-ख़ाना है

इख़्तिलात अपने अनासिर में नहीं
जो है मेरे जिस्म में बेगाना है

क्या समुंदर को दिखाएँ गर्मियाँ
दोज़ख़ अपना एक आतिश-ख़ाना है

हो गए मिस्ल-ए-सुलैमाँ अहल-ए-इश्क़
ऐ परी क्या हिम्मत-ए-मर्दाना है

दिल है आईना तो अस्कंदर हूँ मैं
हुस्न की दौलत मिरा नज़राना है

अर्श तक गर्दूं से देखा ऐ सनम
सात ज़ीने का ये बाला-ख़ाना है

खेल जाते हैं हज़ारों जान पर
इश्क़-बाज़ी बाज़ी-ए-तिफ़्लाना है

जान देता हूँ मगर आती नहीं
मौत को भी नाज़-ए-मअशूक़ाना है

पाते हैं नक़द-ए-ज़र-ए-गुल बे-हिसाब
बाग़-ए-आलम उस का दौलत-ख़ाना है

आज है महव-ए-शना वो शम्अ'-रू
हर पर-ए-माही पर-ए-परवाना है

दिल कहाँ ये नफ़्स-ए-अम्मारा कहाँ
आइना पेश सग-ए-दीवाना है

इफ़्फ़त-ए-मश्शाता किस से हो बयाँ
पंजा-ए-मरयम तुम्हारा शाना है

मय-कदे के काम दिल से लीजिए
ख़ुम का ख़ुम पैमाना का पैमाना है

लखनऊ का मुझ को सौदा है 'मुनीर'
दिल हुसैनाबाद पर दीवाना है