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सैर करते उसे देखा है जो बाज़ारों में | शाही शायरी
sair karte use dekha hai jo bazaron mein

ग़ज़ल

सैर करते उसे देखा है जो बाज़ारों में

अरशद अली ख़ान क़लक़

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सैर करते उसे देखा है जो बाज़ारों में
मशवरे होते हैं यूसुफ़ के ख़रीदारों में

चाहते हैं कि कोई ग़ैरत-ए-यूसुफ़ फँस जाए
किस क़दर खोटे खरे बनते हैं बाज़ारों में

दो-क़दम चल के जो तू चाल दिखा दे अपनी
ठोकरें खाते फिरें कब्क भी कोहसारों में

ख़ून-ए-उश्शाक़ से लाज़िम है ये परहेज़ करें
कि शुमार आप की आँखों का है बीमारों में

शैख़-ए-काबा हो दिया बरहमन-ए-बुत-ख़ाना
एक ही के दर ये दोनों हैं परस्तारों में

देखिए कितने ख़रीदार हैं क्या उठना है
जिंस दिल भेज के उन को कोई है बाज़ारों में

फ़स्ल-ए-गुल आई ख़िज़ाँ भी हुए गुलज़ार मगर
ताइर-ए-दिल है हुनूज़ उन के गिरफ़्तारों में

सैर के वास्ते निकला जो वो रश्क-ए-यूसुफ़
बंद रस्ते हुए ठट लग गए बाज़ारों में

ये नया यार की सरकार में देखा इंसाफ़
बे-गुनह भी गिने जाते हैं गुनहगारों में

कहीं ढूँडे से भी मिलते थे न अरबाब-ए-कमाल
जिन दिनों क़द्र-शनासी थी ख़रीदारों में

तेग़-ए-क़ातिल के गले मिलते हैं ख़ुश हो हो कर
ईद-ए-क़ुर्बां है मोहब्बत के गुनाह-गारों में

किसी अम्न से न उलझा न हुइ सोहबत-ए-गुल
ऐ ज़ईफ़ी तन-ए-ज़ार अपना है उन ख़ारों में

'क़लक़' इसबात-ए-दहन मुँह को न खुलवाए कहीं
है बड़ी बात अगर बात रही यारों में