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सैर-ए-गुलशन से जो फ़ुर्सत हो इधर भी देखो | शाही शायरी
sair-e-gulshan se jo fursat ho idhar bhi dekho

ग़ज़ल

सैर-ए-गुलशन से जो फ़ुर्सत हो इधर भी देखो

शोला करारवी

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सैर-ए-गुलशन से जो फ़ुर्सत हो इधर भी देखो
रंग-ए-गुल देख चुके दाग़-ए-जिगर भी देखो

मेरी मय्यत पे उसे ख़ाक-बसर भी देखो
ज़िंदगी-भर की रियाज़त का समर भी देखो

नुक़्ता-ए-हुस्न ब-अंदाज़-ए-दिगर भी देखो
इश्क़ का ज़ाविया-ए-हुस्न-ए-नज़र भी देखो

एक ही हुस्न के जल्वे नज़र आएँगे तमाम
आइना-ख़ाना-ए-दुनिया में जिधर भी देखो

हसरत-ओ-यास-ओ-ग़म-ओ-रंज हैं मेहमाँ दिल में
कितना आबाद है अल्लाह का घर भी देखो

बिखरी सिन्दूर भरी ज़ुल्फ़ों में रू-ए-रौशन
सुर्ख़ी-ए-शाम में उनवान-ए-सहर भी देखो

मरते मरते न हटे राह-ए-मोहब्बत से क़दम
मुझ में सौ ऐब सही एक हुनर भी देखो

फ़र्क़ करते नहीं 'शो'ला' ख़ज़फ़-ओ-गौहर में
ये सितम-ज़र्फ़ी-ए-अर्बाब-ए-नज़र भी देखो