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सहरा बसे हुए थे हमारी निगाह में | शाही शायरी
sahra base hue the hamari nigah mein

ग़ज़ल

सहरा बसे हुए थे हमारी निगाह में

प्रीतपाल सिंह बेताब

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सहरा बसे हुए थे हमारी निगाह में
ख़ेमा लगा न पाए हम आब-ओ-गियाह में

सदियाँ हमारी राह को रोके खड़ी रहीं
और ज़िंदगी गुज़रती रही साल-ओ-माह में

बस जाते हम कहीं भी समुंदर के दरमियाँ
आया मगर न कोई जज़ीरा ही राह में

इक बार हाथ लग गए उस अंधी भीड़ के
वापस न लौट पाए हम अपनी पनाह में

वक़्त और मक़ाम से न कभी हम गुज़र सके
गुज़रे मक़ाम-ओ-वक़्त फ़क़त रस्म-ओ-राह में

कुछ देर ज़ेर-ए-पा जो ठहरती कोई ज़मीं
हम भी क़याम करते किसी जाए-गाह में

'बेताब' पस्तियों से निकल ही न पाए हम
क्या क्या बुलंदियाँ थीं हमारी निगाह में