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सहमे से थे परिंद बसेरा उदास था | शाही शायरी
sahme se the parind basera udas tha

ग़ज़ल

सहमे से थे परिंद बसेरा उदास था

इशरत क़ादरी

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सहमे से थे परिंद बसेरा उदास था
जंगल की तरह शहर में ख़ौफ़-ओ-हिरास था

दोनों ही अजनबी थे मगर टूट कर मिले
मैं दर्द-आश्ना वो सितारा-शनास था

किस तमकनत से अंजुमन आरास्ता किए
तन्हाइयों में कोई मिरे आस-पास था

आँखों से मेरी सुब्ह तक आँसू न थम सके
कल रात वो मिला तो बहुत ही उदास था

अपनी तो इंतिशार में गुज़री तमाम उम्र
वो कोई और हैं जिन्हें माहौल रास था

उस ने कुछ इस अदा से पज़ीराई की मिरी
तहज़ीब-ए-हुस्न पर मैं सरापा सिपास था

सम्त-ए-सफ़र बदल देगा वो अगले मोड़ पर
'इशरत' मुझे गुमाँ था न कोई क़यास था