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सहर से एक किरन की फ़क़त तलब थी मुझे | शाही शायरी
sahar se ek kiran ki faqat talab thi mujhe

ग़ज़ल

सहर से एक किरन की फ़क़त तलब थी मुझे

मोहसिन एहसान

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सहर से एक किरन की फ़क़त तलब थी मुझे
तमाम रात मगर बेकली ग़ज़ब थी मुझे

कनार-ए-शाम पे सुर्ख़ी शफ़क़ की दौड़ गई
लहू उगलने की यूँ आरज़ू भी कब थी मुझे

पते की इक न कही सुब्ह के उजालों में
ये और बात कि अज़बर हदीस-ए-शब थी मुझे

मैं तेरी रूह की पहनाई में उतर न सका
कि तुझ से सिर्फ़ तमन्ना-ए-लब-ब-लब थी मुझे

मैं ख़ुद ही बज़्म भी और ख़ुद ही बज़्म-आरा भी
कि नागवार हर इक महफ़िल-ए-तरब थी मुझे

मैं अपने वक़्त का सुक़रात तो नहीं लेकिन
जहाँ पे बात छिड़ी फिर वहीं पे शब थी मुझे

मैं अपनी ज़ात के अंदर कभी न झाँक सका
ये और बात कि ये आरज़ू भी कब थी मुझे

फ़सील-ए-शब से कोई अब पुकारता है तो क्या
मिला न एक भी उस दिन तलाश जब थी मुझे

शिकायत-ए-शब-ए-हिज्राँ कभी न की 'मोहसिन'
हिकायत-ए-ग़म-ए-दिल वर्ना याद सब थी मुझे