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सहर की जुम्बिश क़द-ए-मतानत पे रह गई थी | शाही शायरी
sahar ki jumbish qad-e-matanat pe rah gai thi

ग़ज़ल

सहर की जुम्बिश क़द-ए-मतानत पे रह गई थी

आमिर नज़र

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सहर की जुम्बिश क़द-ए-मतानत पे रह गई थी
क़फ़स की तल्ख़ी लब-ए-शिकायत पे रह गई थी

ज़मीं पे शो'लात उग रहे थी मगर वो चुप थी
शुआ-ए-तीरा लिबास-ए-वहशत पे रह गई थी

तनाब-ए-शह-रग उखाड़ डाली ग़म-ए-सुकूँ ने
हयात दुनिया की ख़स्ता हालत पे रह गई थी

फ़सील-ए-शश्दर के बाम पर हो रही है अफ़्शाँ
जो शम-ए-साअ'त जबीन-ए-हसरत पे रह गई थी

बिसात गर्दिश के दाएरों में सिमट चुकी थी
मगर वो ज़ौक़-ए-करम की वुसअ'त पे रह गई थी

ख़िरद के पहलू की सहमी सहमी निगाह 'आमिर'
सुतून-ए-बे-दर की तंग क़ामत पे रह गई थी