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सहल यूँ राह-ए-ज़िंदगी की है | शाही शायरी
sahal yun rah-e-zindagi ki hai

ग़ज़ल

सहल यूँ राह-ए-ज़िंदगी की है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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सहल यूँ राह-ए-ज़िंदगी की है
हर क़दम हम ने आशिक़ी की है

हम ने दिल में सजा लिए गुलशन
जब बहारों ने बे-रुख़ी की है

ज़हर से धो लिए हैं होंट अपने
लुत्फ़-ए-साक़ी ने जब कमी की है

तेरे कूचे में बादशाही की
जब से निकले गदागरी की है

बस वही सुर्ख़-रू हुआ जिस ने
बहर-ए-ख़ूँ में शनावरी की है

जो गुज़रते थे 'दाग़' पर सदमे
अब वही कैफ़ियत सभी की है