EN اردو
सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री | शाही शायरी
sadme guzre iza guzri

ग़ज़ल

सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री

रिन्द लखनवी

;

सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री
हिज्र में तेरे क्या क्या गुज़री

हिज्र में जान रही या गुज़री
'रिंद' कहो तुम पर क्या गुज़री

क्या कहूँ तुझ से हाल-ए-फ़ुर्क़त
गुज़री जो कुछ जाना गुज़री

उल्फ़त-ए-बुत ने कर दिया काफ़िर
ये क्या बार-ए-ख़ुदाया गुज़री

आए नहीं तुम अर्सा गुज़रा
मनअ किया किस ने क्या गुज़री

गुज़रे जिस दम हम दुनिया से
हम ने जाना दुनिया गुज़री

बहर-ए-जहाँ में ज़ीस्त हमारी
शक्ल-ए-हबाब-ए-दरिया गुज़री

किस से कहिए कौन सुनेगा
क्या क्या गुज़रा क्या क्या गुज़री

कहता था मैं इश्क़ से बाज़ आ
देखा जो दिल-ए-शैदा गुज़री

मर भी गए हम वाह-री ग़फ़लत
उन को ख़बर भी न असला गुज़री

अब तो है शग़्ल-ए-ख़ूँ-आशामी
नौबत-ए-जाम-ओ-मीना गुज़री

काफ़िर पर भी न गुज़रे ऐसी
हम पर जो बुत-ए-तरसा गुज़री

वक़्त-ए-मर्ग ये जी में गुज़रा
ज़िंदगी अपनी बेजा गुज़री

नाला कैसा आह नहीं की
क्या क्या तुझ बिन ईज़ा गुज़री

टूट चुका है रिश्ता-ए-उल्फ़त
यास है अब तो तमन्ना गुज़री

दूसरा तुझ सा कोई न देखा
पेश-ए-नज़र इक दुनिया गुज़री

देख के हाल-ए-मरीज़-ए-फ़ुर्क़त
हालत हम पे मसीहा गुज़री

क़ाबिल-ए-दीद न देखीं आँखें
मुद्दत नर्गिस-ए-शहला गुज़री

ग़श क्यूँ आया हम से तो कहिए
क्या कुछ हज़रत-ए-मूसा गुज़री

क्यूँ-कर झेली आफ़त-ए-फ़ुर्क़त
'रिंद' कहो दिल पर क्या गुज़री