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सड़कों पे घूमने को निकलते हैं शाम से | शाही शायरी
saDkon pe ghumne ko nikalte hain sham se

ग़ज़ल

सड़कों पे घूमने को निकलते हैं शाम से

रईस फ़रोग़

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सड़कों पे घूमने को निकलते हैं शाम से
आसेब अपने काम से हम अपने काम से

नश्शे में डगमगा के न चल सीटियाँ बजा
शायद कोई चराग़ उतर आए बाम से

दम क्या लगा लिया है कि सारे दुकान-दार
चखने में लग रहे हैं मुझे तुर्श आम से

ग़ुस्से में दौड़ते हैं ट्रक भी लदे हुए
मैं भी भरा हुआ हूँ बहुत इंतिक़ाम से

दुश्मन है एक शख़्स बहुत एक शख़्स का
हाँ इश्क़ एक नाम को है एक नाम से

मेरे तमाम अक्स मिरे कर्र-ओ-फ़र्र के साथ
मैं ने भी सब को दफ़्न किया धूम-धाम से

मुझ बे-अमल से रब्त बढ़ाने को आए हो
ये बात है अगर तो गए तुम भी काम से

डर तो ये है हुई जो कभी दिन की रौशनी
उस रौशनी में तुम भी लगोगे अवाम से

जिस दिन से अपनी बात रखी शायरी के बीच
मैं कट के रह गया शोअरा-ए-कराम से