EN اردو
सदा ज़-फ़ैज़-ए-असर ख़ामुशी न बन जाए | शाही शायरी
sada za-faiz-e-asar KHamushi na ban jae

ग़ज़ल

सदा ज़-फ़ैज़-ए-असर ख़ामुशी न बन जाए

मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी

;

सदा ज़-फ़ैज़-ए-असर ख़ामुशी न बन जाए
जो बात कह न सकूँ आप ही न बन जाए

किस इंतिज़ार में है घर का बंद दरवाज़ा
हवा भी साया-ए-ज़ंजीर ही न बन जाए

वो घुट के मर ही न जाए जो मेरे अंदर है
मिरा वजूद ही मेरी नफ़ी न बन जाए

तिरी वफ़ा मिरी नस नस में ज़हर भर देगी
ये दोस्ती भी तिरी दुश्मनी न बन जाए

तुम्हारे माथे पे उभरी है जो शिकन की तरह
यही लकीर भटक कर हँसी न बन जाए

उठाऊँ नज़्म का घुँघट तो सामने तुम हो
ग़ज़ल कहूँ तो तुम्हारी छबी न बन जाए