सदा का लोच सुख़न का निखार ले के चले
तिरी नज़र से फुसून-ए-बहार ले के चले
तिरे जमाल की सुब्ह-ए-जवाँ थी आँखों में
जबीं पे शाम-ए-सितम का ग़ुबार ले के चले
रह-ए-वफ़ा में मता-ए-सफ़र की बात न पूछ
बस एक ज़िंदगी-ए-मुस्तआ'र ले के चले
न यार लुत्फ़ पे माइल न शहर दर्द-शनास
कहाँ ये हम दिल-ए-उम्मीद-वार ले के चले
तलब की राह में इक ये भी हादिसा गुज़रा
हम अपने ज़ौक़-ए-नज़र का वक़ार ले के चले
ग़ज़ल
सदा का लोच सुख़न का निखार ले के चले
जमील यूसुफ़

