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सच का लम्हा जब भी नाज़िल होता है | शाही शायरी
sach ka lamha jab bhi nazil hota hai

ग़ज़ल

सच का लम्हा जब भी नाज़िल होता है

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

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सच का लम्हा जब भी नाज़िल होता है
कितनी उलझन में अपना दिल होता है

मेरी ख़ुशी का भेद है बस ये सब का दुख
मेरे अपने दुख में शामिल होता है

इल्म की मेरे यार सनद पहचान नहीं
बहुत पढ़ा लिक्खा भी जाहिल होता है

सय्यद-ज़ादे दिल माँगो या दाद-ए-हुनर
साइल तो हर हाल में साइल होता है

बीत गई जब उम्र तो ये मालूम हुआ
एक इशारा उम्र का हासिल होता है

एक हँसी लाचारी को कुछ और बढ़ाए
एक हँसी से दुश्मन घाइल होता है

ऐ मिरे दिल ऐ अच्छे दिल ऐ ख़ाना-ख़राब
तू क्यूँ हर तकरार में शामिल होता है

सह लें हम दुनिया के सितम 'शाहीन' मगर
ज़िद्दी दिल हर आन मुक़ाबिल होता है