सभी ये पूछते रहते हैं क्या गुम हो गया है
बता दूँ? मुझ से ख़ुद अपना पता गुम हो गया है
तुम्हारे दिन में इक रूदाद थी जो खो गई है
हमारी रात में इक ख़्वाब था, गुम हो गया है
वो जिस के पेच-ओ-ख़म में दास्ताँ लिपटी हुई थी
कहानी में कहीं वो माजरा गुम हो गया है
ज़रा अहल-ए-जुनूँ आओ हमें रस्ता सुझाओ
यहाँ हम अक़्ल वालों का ख़ुदा गुम हो गया है
नज़र बाक़ी है लेकिन ताब-ए-नज़्ज़ारा नहीं अब
सुख़न बाक़ी है लेकिन मुद्दआ' गुम हो गया है
मुझे दुख है कि ज़ख़्म ओ रंज के इस जमघटे में
तुम्हारा और मेरा वाक़िआ' गुम हो गया है
ये शिद्दत दर्द की उस के न होने से न होती
यक़ीनन और कुछ उस के सिवा गुम हो गया है
वो जिस को खींचने से ज़ात की परतें खुलेंगी
हमारी ज़िंदगी का वो सिरा गुम हो गया है
वो दर वा हो न हो, आज़ाद ओ ख़ुद-बीं हम कहाँ के
पलट आएँ तो समझो रास्ता गुम हो गया है
ग़ज़ल
सभी ये पूछते रहते हैं क्या गुम हो गया है
इरफ़ान सत्तार

