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सबब क्या पूछते हो इश्क़ की आशुफ़्ता-हाली का | शाही शायरी
sabab kya puchhte ho ishq ki aashufta-haali ka

ग़ज़ल

सबब क्या पूछते हो इश्क़ की आशुफ़्ता-हाली का

इश्क़ औरंगाबादी

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सबब क्या पूछते हो इश्क़ की आशुफ़्ता-हाली का
दिवाना है किसू दिलबर की वज़्-ए-लाउबाली का

भरा है शहद कानों में समाअत की हलावत से
कहूँ क्या ज़ाइक़ा शीरीं-दहन की ख़ुश-मक़ाली का

तिरी आँखों के आगे रो के आह-ए-सर्द भरता हूँ
कि नित है ज़ौक़ मस्तों को हवा-ए-बरशगाली का

दिल-ए-बे-ताब जिऊँ सीमाब-हसरत से तड़पता है
अदा से जब लहकता हेगा मोती उस की बाली का

किया हूँ इश्क़ में तारीफ़ उस मह-रू के अबरू की
हर इक मिस्रा है मेरा रश्क दीवान-ए-हिलाली का