सबब क्या पूछते हो इश्क़ की आशुफ़्ता-हाली का
दिवाना है किसू दिलबर की वज़्-ए-लाउबाली का
भरा है शहद कानों में समाअत की हलावत से
कहूँ क्या ज़ाइक़ा शीरीं-दहन की ख़ुश-मक़ाली का
तिरी आँखों के आगे रो के आह-ए-सर्द भरता हूँ
कि नित है ज़ौक़ मस्तों को हवा-ए-बरशगाली का
दिल-ए-बे-ताब जिऊँ सीमाब-हसरत से तड़पता है
अदा से जब लहकता हेगा मोती उस की बाली का
किया हूँ इश्क़ में तारीफ़ उस मह-रू के अबरू की
हर इक मिस्रा है मेरा रश्क दीवान-ए-हिलाली का
ग़ज़ल
सबब क्या पूछते हो इश्क़ की आशुफ़्ता-हाली का
इश्क़ औरंगाबादी

