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सब तमाशे हो चुके अब घर चलो | शाही शायरी
sab tamashe ho chuke ab ghar chalo

ग़ज़ल

सब तमाशे हो चुके अब घर चलो

सुहैल अहमद ज़ैदी

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सब तमाशे हो चुके अब घर चलो
दीदा-ओ-दिल खो चुके अब घर चलो

कर चुके सैराब अश्कों से ज़मीं
दर्द-दाना बो चुके अब घर चलो

कर चुके टोपी में जुगनू को असीर
साँप का मन खो चुके अब घर चलो

ख़्वाहिशें थक-हार के रुख़्सत हुईं
बोझ सारे ढो चुके अब घर चलो

मुंतज़िर होगा कोई दहलीज़ पर
इस सरा में सो चुके अब घर चलो

काटने को दौड़ता है रास्ता
हम-सफ़र सब खो चुके अब घर चलो

इक नई करवट बदल डालो 'सुहैल'
सब ही पहलू सो चुके अब घर चलो