सब नक़्श इस फ़लक के नगीने पे आ रहे
कार-ए-जहाँ तमाम कमीने पे आ रहे
आगे जो दिलबरी थी सो आशिक़-कुशी है अब
जो काम मेहर के थे सो कीने पे आ रहे
ग़ुस्से में जोश मारा जो दरिया-ए-हुस्न ने
जल्वे नज़ाकतों के पसीने पे आ रहे
डरता है दिल कि इस पे तरक़्क़ी न हो कहीं
मिलने के वक़्त अब तो महीने पे आ रहे
तू कुछ न बोले और मज़ा हो कि मेरा हाथ
काँधे से तेरे मस्ती में सीने पे आ रहे
दरिया-ए-दिल की मौज से ख़तरा है चश्म को
मत ये कहीं उछल के सफ़ीने पे आ रहे
पूली तले गुज़र गई लाखों की उम्र अब
गुम्बद में कोई कौन से जीने पे आ रहे
जिन का दिमाग़ अर्श पे था अब हैं पाएमाल
कोठे पे जो कि रहते थे ज़ीने पे आ रहे
गंज-ए-निहाँ से दिल के तो वाक़िफ़ हुए न हम
क्या फ़ाएदा जो ज़र के दफ़ीने पे आ रहे
दो दिन के चाव-चूज़ 'हसन' के वो हो चुके
फिर रफ़्ता रफ़्ता अपने क़रीने पे आ रहे
ग़ज़ल
सब नक़्श इस फ़लक के नगीने पे आ रहे
मीर हसन

