EN اردو
सब हैं मसरूफ़ किसी को यहाँ फ़ुर्सत नहीं है | शाही शायरी
sab hain masruf kisi ko yahan fursat nahin hai

ग़ज़ल

सब हैं मसरूफ़ किसी को यहाँ फ़ुर्सत नहीं है

शाहिद कमाल

;

सब हैं मसरूफ़ किसी को यहाँ फ़ुर्सत नहीं है
सब ज़रूरत है मगर कार-ए-ज़रूरत नहीं है

तुझ से दुश्नाम-तराज़ों की हिमायत के लिए
अब मिरे पास कोई हर्फ़-ए-सुहूलत नहीं है

रोज़ इक हश्र बपा करते थे जिस की ख़ातिर
हम ये सुनते हैं कि वो फ़ित्ना-ए-क़ामत नहीं है

अक्स-ए-रम-साज़ी-ए-वहशत से उसे है निस्बत
अब तो आईनों को पहली सी वो हैरत नहीं है

किस लिए तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ पे नदामत है तुझे
ऐ मिरी जान मुझे कोई शिकायत नहीं है

रक़्स-ए-आशोब अजब देखा है गलियों में तिरी
ऐ मिरे शहर यहाँ कोई सलामत नहीं है

हुक्म है ख़ाना-ए-वहशत के मकीनों से कहो
अब यहाँ साँस भी लेने की इजाज़त नहीं है

ख़ूँ-बहा माँगने वालों को नदामत है बहुत
मेरे क़ातिल को मगर कोई नदामत नहीं है

रम्ज़-ओ-असरार से ख़ाली नहीं होते मिरे शे'र
ये अलग बात कि 'शाहिद' को वो शोहरत नहीं है