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सब बदलते जा रहे हैं सर-ब-सर अपनी जगह | शाही शायरी
sab badalte ja rahe hain sar-ba-sar apni jagah

ग़ज़ल

सब बदलते जा रहे हैं सर-ब-सर अपनी जगह

जमाल एहसानी

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सब बदलते जा रहे हैं सर-ब-सर अपनी जगह
दश्त अब अपनी जगह बाक़ी न घर अपनी जगह

मैं भी नादिम हूँ कि सब के साथ चल सकता नहीं
और शर्मिंदा हैं मेरे हम-सफ़र अपनी जगह

क्यूँ सिमटती जा रही हैं ख़ुद-ब-ख़ुद आबादियाँ
छोड़ते क्यूँ जा रहे हैं बाम-ओ-दर अपनी जगह

जो कुछ इन आँखों ने देखा है मैं उस का क्या करूँ
शहर में फैली हुई झूटी ख़बर अपनी जगह

मैं 'जमाल' अपनी जगह से इस लिए हटता नहीं
वो घड़ी आ जाए शायद लौट कर अपनी जगह