साज़ आहिस्ता ज़रा गर्दिश-ए-जाम आहिस्ता
जाने क्या आए निगाहों का पयाम आहिस्ता
चाँद उतरा कि उतर आए सितारे दिल में
ख़्वाब में होंटों पे आया तिरा नाम आहिस्ता
कू-ए-जानाँ में क़दम पड़ते हैं हल्के हल्के
आशियाने की तरफ़ ताइर-ए-बाम आहिस्ता
उन के पहलू के महकते हुए शादाँ झोंके
यूँ चले जैसे शराबी का ख़िराम आहिस्ता
और भी बैठे हैं ऐ दिल ज़रा आहिस्ता धड़क
बज़्म है पहलू-ब-पहलू है कलाम आहिस्ता
ये तमन्ना है कि उड़ती हुई मंज़िल का ग़ुबार
सुब्ह के पर्दे में याद आ गई शाम आहिस्ता
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ग़ज़ल
साज़ आहिस्ता ज़रा गर्दिश-ए-जाम आहिस्ता
मख़दूम मुहिउद्दीन