साक़ी-ए-ख़ुम-ख़ाना था जो सुब्ह-ओ-शाम
रोज़-ए-आदीना था मस्जिद में इमाम
जिस ने चश्म-ए-मस्त-ए-साक़ी देख ली
ता-क़यामत उस पे हुश्यारी हराम
इस लब-ए-जाँ-बख़्श की बातें थीं या
मो'जज़ात-ए-ईसी-ए-गर्दूं-मक़ाम
हो गया उस को क़यामत का यक़ीं
जिस ने देखा सर्व-क़ामत का ख़िराम
चश्मा-ए-आब-ए-बक़ा की लहर थी
वो इबारत वो इशारत ला-कलाम
मर्हबा इत्र-ए-गरेबाँ की शमीम
है मोअत्तर जिस से रूहानी मशाम
थी ज़बाँ या क़ाते-ए-औहाम या
ज़ुल्फ़िक़ार-ए-हैदरी थी बे-नियाम
जिस ने देखा नर्गिस-ए-शहला का ख़्वाब
इस ने पाया रम्ज़-ए-क़लबी ला-यनाम
क़ाला अत्ममतो अलैकुम नेमती
हो गईं सब ख़ूबियाँ उस पर तमाम
जिस ने चाटी उत्बा-ए-उल्या की ख़ाक
तल्ख़ी-ए-दौराँ से हो क्यूँ तल्ख़-काम
ऐ सबा सहरा-ए-जाँ में कर तलाश
किस तरफ़ हैं वो सुरादिक़ वो ख़ियाम
ख़ल्वत-ए-लैला में तू गुज़रे अगर
तो ये कह देना हमारा भी पयाम
तिश्नगान-ए-शौक़ हैं गुम-कर्दा-राह
तू भी चल बहर-ए-ख़ुदा दो-चार गाम
बहर में बरपा हुआ जोश-ओ-ख़रोश
हब्बज़ा रुश्हात-ए-कासातिल-किराम
सौंप दी थी दस्त-ए-क़ुदरत ने तुझे
नाक़ा-ए-लैला-ए-मा'नी की ज़माम
ग़ज़ल
साक़ी-ए-ख़ुम-ख़ाना था जो सुब्ह-ओ-शाम
इस्माइल मेरठी

