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साँस लेते हुए डर लगता है | शाही शायरी
sans lete hue Dar lagta hai

ग़ज़ल

साँस लेते हुए डर लगता है

आलोक मिश्रा

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साँस लेते हुए डर लगता है
ज़हर-आलूद धुआँ फैला है

किस ने सहरा में मिरी आँखों के
एक दरिया को रवाँ रक्खा है

कोई आवाज़ न जुम्बिश कोई
मेरा होना भी कोई होना है

बात कुछ भी न करूँगा अब के
रू-ब-रू उस के फ़क़त रोना है

ज़ख़्म धोए हैं यहाँ पर किस ने
सारे दरिया में लहू फैला है

इतना गहरा है अँधेरा मुझ में
पाँव रखते हुए डर लगता है

शख़्स हँसता है जो आईने में
याद पड़ता है कहीं देखा है

चाट जाए न मुझे दीमक सा
ग़म जो सीने से मिरे लिपटा है

जाने क्या खोना है अब भी मुझ को
फिर से क्यूँ जी को वही ख़दशा है