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सानेहा नहीं टलता सानेहे पे रोने से | शाही शायरी
saneha nahin Talta sanehe pe rone se

ग़ज़ल

सानेहा नहीं टलता सानेहे पे रोने से

पीरज़ादा क़ासीम

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सानेहा नहीं टलता सानेहे पे रोने से
हब्स-ए-जाँ न कम होगा बे-लिबास होने से

अब तो मेरा दुश्मन भी मेरी तरह रोता है
कुछ गिले तो कम होंगे साथ साथ रोने से

मतन-ए-ज़ीस्त तो सारा बे-नुमूद लगता है
दर्द-ए-बे-निहायत का हाशिया न होने से

सच्चे शेर का खलियान और भरता जाता है
दर्द की ज़मीनों में ग़म की फ़स्ल बौने से

हादसात-ए-पैहम का ये मआल है शायद
कुछ सुकून मिलता है अब सुकून खोने से

किस हुनर से यारों ने दास्ताँ रक़म कर ली
मेरे ख़ून-ए-दिल में ही उँगलियाँ डुबोने से