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सामान-ए-फ़राग़ जल रहा है | शाही शायरी
saman-e-faragh jal raha hai

ग़ज़ल

सामान-ए-फ़राग़ जल रहा है

सय्यद अमीन अशरफ़

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सामान-ए-फ़राग़ जल रहा है
सहरा हो कि बाग़ जल रहा है

है शाख़-ए-निहाल पर समेटे
बुलबुल हो कि ज़ाग़ जल रहा है

हाथों में दहक रहा है प्याला
होंटों में अयाग़ जल रहा है

जो फ़स्ल-ए-जुनूँ में खिल रहा था
वो क़र्या-ए-दाग़ जल रहा है

वहशत भी फुसून-ए-मुश्तरक है
दिल हो कि दिमाग़ जल रहा है

फिर भी है चहार-सू अँधेरा
सदियों से चराग़ जल रहा है