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साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए | शाही शायरी
sahil pe ruk ke su-e-samundar na dekhiye

ग़ज़ल

साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए

आज़ाद गुलाटी

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साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए
बाहर से अपने आप का मंज़र न देखिए

अपने वजूद ही पे न गुज़रीं कई शोकूक
साए को अपने क़द के बराबर न देखिए

जागे तो महज़ रेत ही पाएँगे हर तरफ़
गर हो सके तो ख़्वाब में सागर न देखिए

अपने ही सर के ज़ख़्म का कुछ कीजिए इलाज
आया है किस तरफ़ से ये पत्थर न देखिए

यकजा न करने आएगा कोई तमाम उम्र
ख़ुश-फ़हमियों से ख़ुद में बिखर कर न देखिए

फिर यूँ न हो कि अपना बदन अजनबी लगे
बेहतर है इस के ख़ोल से बाहर न देखिए

'आज़ाद' जी डराएगा परछाइयों का ख़ौफ़
वीराँ नज़र से कोई भी मंज़र न देखिए