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रूह सुलगती रक्खी है और सीना जलता रक्खा है | शाही शायरी
ruh sulagti rakkhi hai aur sina jalta rakkha hai

ग़ज़ल

रूह सुलगती रक्खी है और सीना जलता रक्खा है

मुनीर सैफ़ी

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रूह सुलगती रक्खी है और सीना जलता रक्खा है
उस ने मुझ को लाखों इंसानों से अच्छा रक्खा है

तुम रौशन कर रक्खो जितने हिज्र अलाव मुमकिन हों
मैं ने भी अपनी आँखों के पीछे दरिया रक्खा है

आँख कहाँ है एक आफ़त गोया रक्खी है चेहरे पर
दिल कब है मेरे पहलू में एक तमाशा रक्खा है

जो मुझ में खुल कर हँसता और सावन-भादों रोता था
उस बच्चे को मैं ने अब तक ख़ुद में ज़िंदा रक्खा है

जिस दिन मेरी धरती अपनी चादर मुझ पर डालेगी
बस उस दिन की ख़ातिर मैं ने ख़ुद को ज़िंदा रक्खा है

ख़ाक-बसर फिरती हैं जिस में लैलाएँ दिन-रात 'मुनीर'
मैं ने अपनी ज़ा में एक ऐसा भी सहरा रक्खा है