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रूदाद-ए-जाँ कहें जो ज़रा दम मिले हमें | शाही शायरी
rudad-e-jaan kahen jo zara dam mile hamein

ग़ज़ल

रूदाद-ए-जाँ कहें जो ज़रा दम मिले हमें

अमीर इमाम

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रूदाद-ए-जाँ कहें जो ज़रा दम मिले हमें
उस दिल के रास्ते में कई ख़म मिले हमें

लब्बैक पहले हम ने कहा था रसूल-ए-हुस्न
हो कार-ज़ार-ए-इश्क़ तो परचम मिले हमें

आए इक ऐसा ज़ख़्म जो भरना न हो कभी
या'नी हर एक ज़ख़्म का मरहम मिले हमें

दिन में जहाँ सराब मिले थे हमें वहाँ
आई जो रात क़तरा-ए-शबनम मिले हमें

तुम जैसे और लोग भी होंगे जहान में
ये बात और है कि बहुत कम मिले हमें

जब साथ थे तो मिल के भी मिलना न हो सका
जब से बिछड़ गए हो तो पैहम मिले हमें

और फिर हमें भी ख़ुद पे बहुत प्यार आ गया
उस की तरफ़ खड़े हुए जब हम मिले हमें

जो उम्र-भर का साथ निभाता न मिल सका
वैसे तो ज़िंदगी में बहुत ग़म मिले हमें