रू-ए-ख़ंदाँ रग-ए-जाँ दीदा-ए-गिर्यां जैसे
क़फ़स-ए-रंग है ये आलम-ए-इम्काँ जैसे
नश्शा-ए-शेर उड़ाए लिए जाता है मुझे
जैसे रहवार-ए-सबा तख़्त-ए-सुलैमाँ जैसे
आरज़ू ही से है हंगामा-ए-आलम सारा
आरज़ू ही से है दिल तिफ़्लक-ए-नादाँ जैसे
आँच भी आती है ख़ुश-पैरहनी से अक्सर
कहीं रोईदगी-ए-शो'ला हो पिन्हाँ जैसे
शाम-ए-तन्हाई कलीद-ए-दर-ए-नज़्ज़ारा है
जैसे मिज़्गान-ए-सियह अबरू-ए-जानाँ जैसे
हर्फ़-ए-सादा वरक़-ए-नम सुख़न-ए-ख़ुद-रफ़्ता
दिल है या मीर-तक़ी-'मीर' का दीवाँ जैसे
बे-रवा बे-सर-ओ-पा एक अलम-नाक सदा
ज़िंदगी क़ाफ़िला-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ जैसे
बूढे बरगद के तले सोच में गुम मर्द-ए-फ़क़ीर
आने वाला है कहीं से कोई तूफ़ाँ जैसे
ग़ज़ल
रू-ए-ख़ंदाँ रग-ए-जाँ दीदा-ए-गिर्यां जैसे
सय्यद अमीन अशरफ़

