रुस्वा हुए बग़ैर न नाज़-ए-बुताँ उठा
जब हो गए सुबुक तो ये बार-ए-गिराँ उठा
मा'नी में कर तलाश मआ'श-ए-दिल-ओ-दिमाग़
हैवाँ-सिफ़त न लज़्ज़त-ए-काम-ओ-दहाँ उठा
गर ख़ंदा याद आए तो सीने को चाक कर
गर ग़म्ज़ा याद आए तो ज़ख़्म-ए-सिनाँ उठा
या आँख उठा के चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़ को न देख
या उम्र-भर मसाइब-ए-दौर-ए-ज़माँ उठा
उस अंजुमन में जाइए अब किस उमीद पर
हम बैठने न पाए कि वो बद-गुमाँ उठा
बे-याद-ए-दोस्त उमर-ए-गिरामी न सर्फ़ कर
उस गंज-ए-शाएगाँ को न यूँ राएगाँ उठा
वस्ल-ओ-फ़िराक़ वहम सही दिल-लगी तो है
फिर हम कहाँ जो पर्दा-ए-राज़-ए-निहाँ उठा
परवाने की तपिश ने ख़ुदा जाने कान में
क्या कह दिया कि शम्अ' के सर से धुआँ उठा
ग़ज़ल
रुस्वा हुए बग़ैर न नाज़-ए-बुताँ उठा
इस्माइल मेरठी

