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रुकूँ तो रुकता है चलने पे साथ चलता है | शाही शायरी
rukun to rukta hai chalne pe sath chalta hai

ग़ज़ल

रुकूँ तो रुकता है चलने पे साथ चलता है

शफ़ीक़ सलीमी

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रुकूँ तो रुकता है चलने पे साथ चलता है
मगर गिरफ़्त में आता नहीं कि साया है

झुलस रहे हैं बदन धूप की तमाज़त से
कि रात भर बड़े ज़ोरों का अब्र बरसा है

अभी तो कल की थकन जिस्म से नहीं निकली
सितम कि आज का दिन भी पहाड़ जैसा है

समझ रहे थे जिसे एक मेहरबाँ बादल
वो आग बन के हरी खेतियों पे बरसा है

वो एक शख़्स जिसे आज तक नहीं देखा
ख़याल-ओ-फ़िक्र पे उस शख़्स का इजारा है

दबीज़ पर्दों के पीछे न झाँकिए कि वहाँ
गए दिनों को निशानी बना के रक्खा है

'शफ़ीक़' ढूँडने निकले थे घर से हम जिस को
वो किर्चियों की तरह रास्तों में बिखरा है