रुख़ हर इक तीर-ए-नज़र का है मिरे दिल की तरफ़
आने वाले आ रहे हैं अपनी मंज़िल की तरफ़
डूबने वाले की मायूसी पे दिल थर्रा गया
किस निगाह-ए-यास से देखा था साहिल की तरफ़
सच है इक उजड़ी हुई दुनिया के क्या लैल-ओ-नहार
तुम से भी अब तो न देखा जाएगा दिल की तरफ़
किस फ़सुर्दा-ख़ातिरी से रात-भर जलती रही
देर तक देखा किए हम शम-ए-महफ़िल की तरफ़
अपनी मर्ज़ी से नहीं अपने इरादे से नहीं
हर मुसाफ़िर के क़दम उठते हैं मंज़िल की तरफ़
तुम को क्या मालूम क्या बनती है दिल पर इश्क़ में
आइना ले कर ज़रा देखो मुक़ाबिल की तरफ़
हो गया 'मख़मूर' राज़-ए-ज़िंदगी का इंकिशाफ़
मौज आती है फ़ना होने को साहिल की तरफ़

ग़ज़ल
रुख़ हर इक तीर-ए-नज़र का है मिरे दिल की तरफ़
मख़मूर देहलवी