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रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता | शाही शायरी
roz ek shaKHs chala jata hai KHwahish karta

ग़ज़ल

रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता

रज़ी अख़्तर शौक़

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रोज़ इक शख़्स चला जाता है ख़्वाहिश करता
अभी आ जाएगा बादल कोई बारिश करता

घर से निकला तो जहाँ-ज़ाद ख़ुदा इतने थे
मैं अना-ज़ाद भी किस किस की परस्तिश करता

हम तो हर लफ़्ज़ में जानाँ तिरी तस्वीर हुए
इस तरह कौन सा आईना सताइश करता

किसी वहशत-ज़दा आसेब की मानिंद हूँ मैं
इक मकाँ में कई नामों से रिहाइश करता

इक न इक दिन तो ये दीवार-ए-क़फ़स गिरनी थी
मैं न करता तो कोई और ये शोरिश करता

अब जो तस्वीर बना ली तो ये धुन और लगी!
कभी देखूँ लब-ए-तस्वीर को जुम्बिश करता

सब अंधेरे में हैं इक अपने मकाँ की ख़ातिर
क्या हवाओं से चराग़ों की सिफ़ारिश करता

और क्या मुझ से तिरी कूज़ा-गरी चाहती है
मैं यहाँ तक तो चला आया हूँ गर्दिश करता

इन ज़मीनों ही पे क्या ख़ोशा-ए-गंदुम के लिए
आसमानों से चला आया हूँ साज़िश करता