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रोज़ दिलहा-ए-मै-कशाँ टूटे | शाही शायरी
roz dilha-e-mai-kashan TuTe

ग़ज़ल

रोज़ दिलहा-ए-मै-कशाँ टूटे

मुनीर शिकोहाबादी

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रोज़ दिलहा-ए-मै-कशाँ टूटे
ऐ ख़ुदा जाम-ए-आसमाँ टूटे

दुश्मनी इस ज़मीन की देखो
गुम्बद-ए-क़ब्र-ए-दोस्ताँ टूटे

वस्फ़-ए-अबरू-ए-पुर-शिकन जो न हो
क्या अजब ख़ंजर-ए-ज़बाँ टूटे

रंग लाए अगर शिकस्ता-दिली
बुलबुलो शाख़-ए-आशियाँ टूटे

निकहत-ए-गुल से बस गया गुलशन
ग़ुंचा क्या चटके इत्र-दाँ टूटे

ख़ूब फैली है बू-ए-बादा-ए-इश्क़
शीशा-ए-दिल कहाँ कहाँ टूटे

ले उड़ेगी हवा-ए-बाम हमें
न करेंगे जो नर्दबाँ टूटे

क़स्द-ए-पर्वाज़ का जो बोझ पड़ा
बाज़ू-ए-मुर्ग़-ए-ना-तवाँ टूटे

लखनऊ चल के जी लगाऊँ 'मुनीर'
किस लिए दिल मिरा यहाँ टूटे