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रोना इन का काम है हर दम जल जल कर मर जाना भी | शाही शायरी
rona in ka kaam hai har dam jal jal kar mar jaana bhi

ग़ज़ल

रोना इन का काम है हर दम जल जल कर मर जाना भी

हबीब मूसवी

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रोना इन का काम है हर दम जल जल कर मर जाना भी
जान-ए-जहाँ उश्शाक़ तुम्हारे शम्अ' भी हैं परवाना भी

सारी उम्र में जो गुज़री थी हम पर वो रूदाद लिखी
पर हुई यूँ मशहूर कि जैसा हो न कोई अफ़्साना भी

इश्क़ सभी करते हैं मगर जो हालत मुझ पर तारी है
मुँह से कहूँ गर हाथ मलेगा अपना भी बेगाना भी

पूछते क्या हो मेरा ठिकाना एक जगह गर हो तो कहूँ
राहगुज़र है यार का दर है मस्जिद भी मय-ख़ाना भी

राह-ए-तलब में चलते फिरते लाखों आते जाते हैं
ख़ल्क़ में है उश्शाक़ की मंज़िल काबा भी बुत-ख़ाना भी

मुझ पर वो बे-तौर ख़फ़ा हैं ग़ैरों के बहकाने से
मिलना कैसा बात कहाँ की बंद है आना जाना भी

एक हमीं क्या पेच में हैं उस ज़ुल्फ़-ए-दोता की उल्फ़त से
मार-ए-सियह हम-रंग है अपना सुंबुल-ए-तर भी शाना भी

कर दी सोहबत दरहम-ओ-बरहम किस की चश्म के अफ़्सूँ ने
बहका साक़ी ढलकी बोतल और छलका पैमाना भी

वाइज़ के मुँह पर न कहो कुछ शरअ' की हुर्मत लाज़िम है
रिंदी में मशरूत नहीं हैं बातें आज़ादाना भी

ख़ंजर-ए-अबरू तेग़-ए-निगह तक़रीर-ए-मुसलसल चश्म-ए-सियाह
तेज़ भी है ख़ूँ-रेज़ भी दिल-आवेज़ भी है मस्ताना भी

कूचे में उस के जम्अ' हैं आशिक़ भीड़ लगी है कोसों तक
शोर भी है हंगामा भी है शाने से छिलता शाना भी

ख़ल्वत-ए-दिल में चैन से बैठो किस से तकल्लुफ़ करते हो
घर है तुम्हारा तुम हो यहाँ मेहमान भी साहब-ख़ाना भी

नाम 'हबीब'-ए-मुज़्तर का मालूम नहीं सब कहते हैं
दर्द-रसीदा आफ़त-दीदा वहशी भी दीवाना भी