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रिज़्क़ का जब नादारों पर दरवाज़ा बंद हुआ | शाही शायरी
rizq ka jab nadaron par darwaza band hua

ग़ज़ल

रिज़्क़ का जब नादारों पर दरवाज़ा बंद हुआ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

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रिज़्क़ का जब नादारों पर दरवाज़ा बंद हुआ
बस्ती के गोशे गोशे से शोर बुलंद हुआ

मतला-ए-बे-अनवार से फूटा शोख़ तबस्सुम किरनों का
रात के घर में सूरज जैसा जब फ़रज़ंद हुआ

सादा बे-आमेज़िश जज़्बा-ए-पीर फ़क़ीर करामत का
जिस के इस्म से मायूसी का ज़हर भी क़ंद हुआ

अव्वल अव्वल शोर उठा सीने में आम तमन्ना का
बंद फ़सीलों के गुम्बद में जो दो-चंद हुआ

दुख को सम्त-शनासाई दी ग़म के क़ुर्बत-दारों ने
दिल धारा दरिया मिल कर बहरा-मंद हुआ

चलिए अपने आप से चिमटे रहना तो मौक़ूफ़ किया
जब से रोज़ के समझौतों का वो पाबंद हुआ