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रस्ते में तो ख़तरात की सुन-गुन भी बहुत है | शाही शायरी
raste mein to KHatraat ki sun-gun bhi bahut hai

ग़ज़ल

रस्ते में तो ख़तरात की सुन-गुन भी बहुत है

रऊफ़ ख़ैर

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रस्ते में तो ख़तरात की सुन-गुन भी बहुत है
मंज़िल पे पहुँचने की हमें धुन भी बहुत है

हर शहर में ताज़ा है तो बस ज़ख़्म-ए-तअ'स्सुब
कुछ लज़्ज़त-ए-नाहक़ का तआ'वुन भी बहुत है

कुछ हाथों से कुछ मातों से कालक नहीं जाती
हर चंद कि बाज़ार में साबुन भी बहुत है

वो हाथ तहफ़्फ़ुज़ की अलामत जिसे कहिए
महसूस ये होता है वही सुन भी बहुत है

इक जिस्म के मानिंद हैं हम लोग कहीं हों
ठोकर से उखड़ता है तो नाख़ुन भी बहुत है

हम शेर कहा करते हैं विज्दान के बल पर
कुछ लोगों को ज़ो'म-ए-फ़इलातुन भी बहुत है