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रस्म-ए-मेहर-ओ-वफ़ा की बात करें | शाही शायरी
rasm-e-mehr-o-wafa ki baat karen

ग़ज़ल

रस्म-ए-मेहर-ओ-वफ़ा की बात करें

सूफ़ी तबस्सुम

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रस्म-ए-मेहर-ओ-वफ़ा की बात करें
फिर किसी दिलरुबा की बात करें

सख़्त बेगाना-ए-हयात है दिल
आओ उस आश्ना की बात करें

ज़ुल्फ़ ओ रुख़्सार के तसव्वुर में
हुस्न ओ नाज़-ओ-अदा की बात करें

गेसुओं के फ़साने दोहराएँ
अपने बख़्त-ए-रसा की बात करें

मुद्दआ-ए-वफ़ा किसे मालूम
दिल-ए-बे-मुद्दआ की बात करें

कश्ती-ए-दिल का नाख़ुदा दिल है
क्यूँ किसी नाख़ुदा की बात करें

भूल जाएँ जहाँ के जौर-ओ-सितम
अपनी मेहर-ओ-वफ़ा की बात करें

हम से आज़ुर्दा है तबस्सुम-ए-दोस्त
इसी हुस्न-ए-अदा की बात करें