EN اردو
रस्म ऐसों से बढ़ाना ही न था | शाही शायरी
rasm aison se baDhana hi na tha

ग़ज़ल

रस्म ऐसों से बढ़ाना ही न था

अज़ीज़ लखनवी

;

रस्म ऐसों से बढ़ाना ही न था
ख़िदमत-ए-नासेह में जाना ही न था

बढ़ गए कुछ और उन के हौसले
रोने वालों को हँसाना ही न था

दिल का भी रखना था हम को कुछ ख़याल
इस तरह आँसू बहाना ही न था

कल ज़माना ख़ुद मिटा देता जिन्हें
ऐसे नक़्शों को मिटाना ही न था

बे-पिए वाइज़ को मेरी राय में
मस्जिद-ए-जामा में जाना ही न था

रह गया आँखों में नक़्शा आप का
नज़अ में सूरत दिखाना ही न था

ख़ुद वो दे देते तो अच्छा था 'अज़ीज़'
क्या कहें यूँ ज़हर खाना ही न था